
भारत में ब्रिटिश शासन प्रणाली (1757-1947) का अध्ययन केवल इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं है; यह हमारे वर्तमान प्रशासन की नसों में दौड़ती वह सच्चाई है जिसे हम रोज़ाना कचहरी, थाने और कलेक्ट्रेट में महसूस करते हैं। अंग्रेजों ने भारत को एक ‘राष्ट्र’ के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘मुनाफ़ा देने वाली जागीर’ के रूप में व्यवस्थित किया था।

आज जब हम आज़ादी के अमृत काल में हैं, तो यह देखना अनिवार्य हो जाता है कि ब्रिटिश ढांचा और भारतीय ज़मीनी हकीकत के बीच कितनी दूरी कम हुई है और कहाँ आज भी हम ‘साहब’ और ‘गुलाम’ वाली मानसिकता के बीच फंसे हैं।
1. ब्रिटिश प्रशासनिक ढांचा: नियंत्रण का एक मास्टरप्लान
अंग्रेजों ने तीन ऐसे स्तंभ खड़े किए थे जिनका उद्देश्य जनसेवा नहीं, बल्कि शासकीय सुरक्षा था:
कलेक्टर प्रणाली: जिला मजिस्ट्रेट (DM) का पद इसलिए बनाया गया था ताकि एक ही व्यक्ति के पास कर वसूलने, न्याय करने और दमन करने की शक्ति हो। वह जिले का ‘अघोषित वायसराय’ था।

1861 का पुलिस एक्ट: यह कानून 1857 के विद्रोह के ठीक बाद बनाया गया था। इसका उद्देश्य पुलिस को जनता का रक्षक नहीं, बल्कि सत्ता का ‘लठैत’ बनाना था।
लालफीताशाही (Bureaucracy): एक ऐसी जटिल फाइल प्रणाली विकसित की गई जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया इतनी धीमी हो जाए कि आम आदमी थककर हार मान ले, लेकिन कागज़ी खानापूर्ति पूरी रहे।
2. वर्तमान ज़मीनी सच्चाई: तुलना और कड़वे अनुभव
स्वतंत्रता के बाद हमने संविधान तो नया अपनाया, लेकिन ‘प्रशासनिक नियमावली’ (Service Rules) वही पुरानी रखी। इसका परिणाम आज की ज़मीनी हकीकत में साफ दिखता है:
क. कलेक्टर: जनसेवक या ज़िलाधीश?
ब्रिटिश काल: कलेक्टर का मतलब था ‘राजस्व इकट्ठा करने वाला’। जनता उससे केवल डरती थी।

ज़मीनी सच्चाई: आज का ‘IAS’ अधिकारी सैद्धांतिक रूप से लोकसेवक है, लेकिन व्यवहार में वह आज भी ‘प्रोटोकॉल’ और ‘लौह आवरण’ (Iron Curtain) के पीछे रहता है। एक आम किसान या मज़दूर के लिए आज भी अपने ज़िले के DM से मिलना उतना ही कठिन है जितना ब्रिटिश काल में रहा होगा। सत्ता का विकेंद्रीकरण (पंचायती राज) होने के बावजूद, अंतिम चाभी आज भी उसी पद के पास है जो अंग्रेजों ने बनाया था।
ख. पुलिस व्यवस्था: रक्षक बनाम भक्षक की छवि
ब्रिटिश काल: पुलिस का काम था डराना। लाठी और खौफ उनके मुख्य औज़ार थे।

ज़मीनी सच्चाई: आज भी भारत के थानों में वही 1861 की ‘पुलिस संस्कृति’ जीवित है। गरीब आदमी थाने जाने से पहले दस बार सोचता है। ‘मित्र पुलिस’ के नारे विज्ञापनों तक सीमित हैं; धरातल पर गाली, बदतमीजी और थर्ड डिग्री जैसे औपनिवेशिक तरीके आज भी जांच का हिस्सा बने हुए हैं। पुलिस आज भी जनता के प्रति कम और अपने ‘राजनीतिक आकाओं’ के प्रति अधिक जवाबदेह महसूस करती है।
ग. न्यायिक व्यवस्था: ‘तारीख-पर-तारीख’ का औपनिवेशिक बोझ
ब्रिटिश काल: न्याय महंगा, अंग्रेजी में और प्रक्रियात्मक उलझनों वाला था।

ज़मीनी सच्चाई: आज भारत की अदालतों में 5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। अंग्रेजों द्वारा बनाई गई ‘कानूनी पेचीदगियां’ आज वकीलों के लिए ढाल और गरीबों के लिए काल बन गई हैं। आज भी उच्च न्यायपालिका की भाषा अंग्रेजी है, जिसे देश की 90% आबादी नहीं समझती। यह भाषा की दीवार ब्रिटिश काल की याद दिलाती है जहाँ न्याय ‘प्रदान’ किया जाता था, ‘साझा’ नहीं।
3. सामाजिक और आर्थिक मोर्चे पर तुलनात्मक वास्तविकता
क्षेत्र ब्रिटिश शासन का उद्देश्य वर्तमान भारत की
ज़मीनी हकीकत
शिक्षा ‘क्लर्क’ पैदा करना (मैकाले की नीति) डिग्री तो है, पर कौशल (Skill) गायब है। हम आज भी रटने
वाली उसी परीक्षा प्रणाली के दास हैं जो अंग्रेजों ने चुनिंदा
अफ़सर चुनने के लिए बनाई थी।
रेलवे/बुनियादी ढांचा कच्चे माल की लूट और सेना का विकास तो हुआ है, लेकिन आज भी हमारा बुनियादी ढांचा
आवागमन ‘मेट्रो शहरों’ के इर्द-गिर्द सिमटा है, ठीक वैसे ही जैसे
अंग्रेजों ने केवल बंदरगाहों और छावनियों को जोड़ा था।
भूमि सुधार ज़मींदारी प्रथा द्वारा शोषण ज़मींदारी खत्म हुई, पर ‘भू-माफिया’ और ‘कागज़ी हेरफेर’ ने
उसकी जगह ले ली। पटवारी प्रणाली आज भी उसी भ्रष्टाचार की
गवाह है जिसकी नींव औपनिवेशिक काल में पड़ी थी।
4. मानसिकता का संकट: ‘साहब’ कल्चर
आज़ाद भारत की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि प्रशासन में ‘साहब कल्चर’ (Brown Sahibs) आज भी हावी है।
सरकारी दफ्तरों में चपरासी का होना, अधिकारियों के लिए अलग डाइनिंग रूम, अर्दली प्रथा—यह सब ब्रिटिश सामंतवाद के अवशेष हैं।
एक आम नागरिक जब किसी सरकारी दफ्तर में जाता है, तो उसे अहसास कराया जाता है कि वह ‘प्रजा’ है और अधिकारी ‘दाता’। यह मानसिकता सीधे तौर पर 1947 से पहले के भारत की याद दिलाती है।
5. बदलाव की रचनात्मक बयार: उम्मीद की किरणें
हालाँकि तस्वीर पूरी तरह धुंधली नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में ज़मीनी स्तर पर ब्रिटिश ढांचे को तोड़ने के प्रयास हुए हैं:
टेक्नोलॉजी बनाम बिचौलिए: ‘Direct Benefit Transfer’ (DBT) ने उस औपनिवेशिक भ्रष्टाचार को चोट पहुंचाई है जिसमें पैसा नीचे तक पहुँचते-पहुँचते गायब हो जाता था। अब ‘बाबू’ की टेबल से पहले पैसा लाभार्थी के खाते में पहुँचता है। ये और बात है कि करोड़ों रुपये फर्जी बैंक अकाउंट्स में डीबीटी करके इस सराहनीय प्रयास पर दाग लगा दिया गया।
कानूनी वि-औपनिवेशीकरण: हाल ही में राजद्रोह (Sedition) जैसे कानूनों पर रोक और IPC/CrPC को भारतीय न्याय संहिता में बदलना इस बात का संकेत है कि हम ‘दमन’ की भाषा को ‘न्याय’ की भाषा से बदलना चाहते हैं। लेकिन पुलिस आधुनिकीकरण में ढिलाई और सत्ताधारियों की खाकी पर निर्भरता ने अभी इसे सपना ही बना रखा है।
RTI (सूचना का अधिकार): यह कानून ब्रिटिश ‘गोपनीयता अधिनियम’ (Official Secrets Act) के सीने पर सबसे बड़ा प्रहार है। इसने आम आदमी को राजा के महल में झांकने की ताकत दी थी परंतु पिछले कुछ वर्षों से RTI की धार को कुंद कर दिया गया है। यहां तक कि कुछ संस्थाओं, कोषों आदि को तो RTI के दायरे से ही बाहर कर दिया गया है।
ब्रिटिश शासन प्रणाली एक ऐसी पुरानी कमीज़ की तरह है जिसे हमने बार-बार रफू करके पहना है। हमने बटन बदले, रंग बदला, लेकिन कट (Cut) वही पुरानी रही।
भारत की वर्तमान शासन व्यवस्था तब तक वास्तव में स्वतंत्र नहीं कहलाएगी, जब तक एक आम आदमी सरकारी तंत्र के पास मदद के लिए जाते समय गर्व महसूस न करे। हमें ‘प्रशासन’ (Administration) से ऊपर उठकर ‘सुशासन’ (Governance) की ओर बढ़ना होगा। औपनिवेशिक ढांचा ‘डर’ पर टिका था, आधुनिक भारतीय ढांचा ‘विश्वास’ पर टिका होना चाहिए।
ज़मीनी सच्चाई यह है कि जंग अभी जारी है—कागज़ों में हम आज़ाद हो चुके हैं, लेकिन प्रशासनिक व्यवहार में आज़ाद होना अभी बाकी है।





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